मंगलवार, 26 अक्तूबर 2010

poem-pahchano ye kis-kis ke nam

जो भी खाता आलू
पीछे पड़ जाता भालू.
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मैंने खाया बेर
डरता मुझसे शेर.
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खाता हूँ मै खूब चुकंदर
मुझसे डरते सारे बन्दर.
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जब खाती हूँ मै अंगूर
आ जाते है तब लंगूर.
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घर में मच गया शोर
आया देखो छत पर मोर
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कहाँ गया जूते क़ा फीता
जंगल में रहता है चीता.
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जिसका हो न कोई साथी
उसका साथी होता हाथी.
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देख कर सूरज की किरण
जंगल में नाचते हिरन.
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बिस्तर पर है एक तकिया
आकाश में उडती सुन्दर चिड़िया.
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लाया देखो मै टमाटर
डोगी पीता ठंडा वाटर
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एक दिन मै चौकी
कौन लाया इतनी मोटी लौकी.
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6 टिप्‍पणियां:

swaran lata ने कहा…

शिखा जी बहुत ही सुन्दर कवितायें है
ताल मेल बहुत ही सुन्दर लगा मगर अफ़सोस मै नही जान नही सकी कि ये कोन है आप जरा सुझाइएना

संजय भास्कर ने कहा…

लाजवाब...प्रशंशा के लिए उपयुक्त कद्दावर शब्द कहीं से मिल गए तो दुबारा आता हूँ...अभी मेरी डिक्शनरी के सारे शब्द तो बौने लग रहे हैं...
वाह...

क्षितिजा .... ने कहा…

bahut achhi koshish hai shikha ji ... likhti rahiye ... aur main bhi nahi jaan pai ye kaun hai ... plz bata dena ...

shikha varshney ने कहा…

बहुत प्यारी बाल कविता है.लिखती रहिये.
मेरे ब्लॉग पर आने का बहुत शुक्रिया.

संजय भास्कर ने कहा…

ब्लॉग को पढने और सराह कर उत्साहवर्धन के लिए शुक्रिया.

par wo meer mita ka blog hai...
vist my own blog
आदत.. मुस्कुराने की
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

राकेश कौशिक ने कहा…

बहुत बहुत सुंदर